हर गोशा गुलिस्तां था कल रात जहां मै था एक जश्न-ए-बहारां था कल रात जहां मै था नग़्मे थे हवाओं में जादू था फ़िज़ाओं में हर साँस ग़ज़लफ़ां था कल रात जहां मै था दरिया-ए-मोहब्बत में कश्ती थी जवानी की जज़्बात का त… more →
कुछ पल जगजीत सिंह के नामरवि कुमार, रावतभाटा wrote 3 months ago: एक नए जहां का आग़ाज़ (a poem by ravi kumar, rawatbhata) मैं एक नदी को मुंजमिद होते नहीं देख सकता और … more →
Amarjeet Singh wrote 1 year ago: हर गोशा गुलिस्तां था कल रात जहां मै था एक जश्न-ए-बहारां था कल रात जहां मै था नग़्मे थे हवाओं में जादू … more →
विनय wrote 1 year ago: वज़नी साँसों में पिस रहा है दिन सारा मुझे आज भी है इन्तिज़ार तुम्हारा नम है नफ़स-नफ़स मेरे सीने में क्यो … more →
विनय wrote 1 year ago: जिसकी यादों में गुज़ारता हूँ मैं सुबह-शाम मंज़िल वह मेरी वह मेरा आख़िरी मुक़ाम वह रंगीन शाम थी शाम वह ग … more →