यह जिस्म नहीं है, काँच के टुकड़े हैं ज़मीने-वक़्त पर दूर तक बिखरे हैं इन्हें मत छूना हाथों में चुभ जायेंगे ये वो दिये हैं, लम्हों में बुझ जायेंगे… My hopes are broken My soul is bruised but you… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 9 months ago: यह जिस्म नहीं है, काँच के टुकड़े हैं ज़मीने-वक़्त पर दूर तक बिखरे हैं इन्हें मत छूना हाथों में चुभ जाय … more →
विनय wrote 1 year ago: मैं उससे मोहब्बत करता था आज भी करता हूँ काँच के दिल में जान भरता हूँ मेरे ख़ाबों में मेरे सपनों में … more →
विनय wrote 1 year ago: दिल से मेरे जो पहली नज़्म निकली थी वह तेरे लिए थी सखी वह तेरे लिए थी तेरे मेरे ख़ाबों की ज़मीं पर सखी … more →
विनय wrote 1 year ago: आज महसूस किया मैंने गर तुम्हें किसी और के साथ देखूँ तो मेरे दिल पे क्या गुज़रेगी कैसा महसूस करूँगा बा … more →