बनारस. गंगा. न जाने ये मुझे अपनी ओर क्यों खींचते से लगते हैं? शायद पिछले जन्म का कोई संबन्ध हो. होटल ताज़ ,जिसे अब गेटवे नाम दिया गया है, की प्रात:बेला. वरिष्ठ सहकर्मी सुधीर जी के साथ घाट की तरफ़ जाने… more →
एक आलसी का चिठ्ठाGirijesh Rao wrote 2 months ago: बनारस. गंगा. न जाने ये मुझे अपनी ओर क्यों खींचते से लगते हैं? शायद पिछले जन्म का कोई संबन्ध हो. होटल … more →
Girijesh Rao wrote 2 months ago: तुलसीदास को पढ़ने के बाद मुझे यही लगा कि एक निहायत ही पारदर्शी व्यक्तित्त्व के साथ समर्थकों और विरोध … more →
pryas wrote 6 months ago: काशी में गंगा के तट पर एक संत का आश्रम था। एक दिन उनके एक शिष्य ने पूछा, ‘गुरुवर, शिक्षा का नि … more →
अफ़लातून wrote 6 months ago: कल सुबह कभी मेरे पड़ोसी प्रयाग पुरी चल बसे । मैं उन्हें बाबाजी बुलाता था । उनका अभिवादन होता था … more →