जैसे-तैसे निभाते हैं प्यार करके पछताते हैं सच्चे-झूठे सपने तेरे रातों की नींदें उड़ाते हैं दो किनारे जिससे मिलते हैं वह पुल टूट गया बारिश बाढ़ बनी कि फिर हाथों से हाथ छूट गया उम्मीदें क्यों रखते हैं ज… more →
तख़लीक़-ए-नज़रदीपक भारतदीप wrote 12 months ago: दिन के सभी पल गुजारे जिन के साथ रात की बैचेनी पर कभी सवाल कभी उन्होंने किया नहीं दिन में ही जब बैचेन … more →
विनय wrote 1 year ago: जैसे-तैसे निभाते हैं प्यार करके पछताते हैं सच्चे-झूठे सपने तेरे रातों की नींदें उड़ाते हैं दो किनारे … more →
विनय wrote 1 year ago: अकेले हम हों कभी, अकेले तुम हो और समन्दर का गुलाबी किनारा हो तन्हाई में हम हों रुसवाई में तुम हो तुम … more →
विनय wrote 2 years ago: दिल की बस्तियाँ जलीं पर उठा नहीं धुँआ बुझाया आँखों से मैंने पर बुझा नहीं धुँआ बहुत देर तक टीस दबाये … more →
प्रेमलता पांडे wrote 3 years ago: जीवन की नदी गहरी है, जो ना कभी ठहरी है, लहर लहर बहती है, सुख-दुख के किनारे छूती रहती है। जीविका की न … more →