बिजली चमकी, पानी गिरने का डर है वे क्यों भागे जाते हैं जिनके घर है वे क्यों चुप हैं जिनको आती है भाषा वह क्या है जो दिखता है धुँआ-धुआँ-सा वह क्या है हरा-हरा-सा जिसके आगे हैं उलझ गए जीने के सारे धागे य… more →
चौपालSatish Chandra satyarthi wrote 5 months ago: [ "अकाल में सारस" कविता संग्रह से ] अब कुछ नहीं था सिर्फ़ हम लौट रहे थे इतने सारे लोग सिर झुकाए हुए … more →
Satish Chandra satyarthi wrote 5 months ago: बिजली चमकी, पानी गिरने का डर है वे क्यों भागे जाते हैं जिनके घर है वे क्यों चुप हैं जिनको आती है भाष … more →
PRIYANKAR wrote 10 months ago: केदारनाथ सिंह की एक कविता मातृभाषा जैसे चींटियां लौटती हैं बिलों में कठफोड़वा लौटता है काठ के … more →
Rewa Smriti wrote 1 year ago: काली मिट्टी काले घर दिन भर बैठे-ठाले घर काली नदिया काला धन सूख रहे हैं सारे बन काला सूरज काले हाथ झु … more →
PRIYANKAR wrote 2 years ago: हिंदी के बारे में एक हिंदी कवि का बयान (कवि मित्र के. सच्चिदानंदन के लिए) मेरी भाषा के लोग मेरी … more →