रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ बारहा तोड़ चुका हूँ जिन को इन्हीं दीवारों से टकराता हूँ रोज़ बसते हैं कई शहर नये रोज़ धरती में समा जाते हैं ज़लज़लों में थी ज़रा सी गिरह वो भी अब … more →
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!Rewa Smriti wrote 2 years ago: रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ बारहा तोड़ चुका हूँ जिन को इन्हीं दीवारों से ट … more →
Rewa Smriti wrote 2 years ago: अज़ा में बहते थे आँसू यहाँ, लहू तो नहीं ये कोई और जगह है ये लखनऊ तो नहीं यहाँ तो चलती हैं छुरिया ज़ु … more →