कोंपलें हर शाख़ बनी पत्तियाँ अब दामने-ग़म में लौट गयी ख़िज़ाँ अब देखो उस रात पर शिगाफ़ आने लग गये असरकार दिल तक हुई फ़ुग़ाँ अब नहाके चाँदनी में रातरानी महक उठी साँस लेना सुकूँ से हो गयी आसाँ अब जैसे लख़्ते… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: कोंपलें हर शाख़ बनी पत्तियाँ अब दामने-ग़म में लौट गयी ख़िज़ाँ अब देखो उस रात पर शिगाफ़ आने लग गये असरका … more →