पसेज़ुल्मत कोई सूरज हमारी ताक में है इसी उम्मीद का दम अब हमारी ख़ाक में है नहीं है ख़ौफ़ किसी ज़ुल्म का हमें यारों आओ देखें के जिगर कितना उस सफ़्फ़ाक में है जो बदलती है रवानी तो बदल ले कौसर रुख़ बदलने का हुनर… more →
इक शायर अंजाना सा...Rohit Jain wrote 5 months ago: पसेज़ुल्मत कोई सूरज हमारी ताक में है इसी उम्मीद का दम अब हमारी ख़ाक में है नहीं है ख़ौफ़ किसी ज़ुल्म का ह … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: मरने की दुआ दे दो हमको जीने का तमाशा और नहीं इस रंज मुसीबत ग़म से भरी दुनिया की तमन्ना और नहीं साहिल … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: देख आऊं वो गिरा खून कहीं मेरा तो नहीं मेरी ही लाश सजी हो कहीं ऐसा तो नहीं टूट ही जाते हैं ख़्वाब, साँ … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: हूँ चल रहा उस राह पर जिसकी कोई मंज़िल नहीं है जुस्तजू उस शख़्स की जो कभी हासिल नहीं वहम जाने ये मेरे इ … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: ना मंज़िलें न रास्ते न हमसफ़र है कोई बोलो इस से बड़ा किसी का सफ़र है कोई जिस सिम्त भी देखूँ नज़र आता है क … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: खुशबू कोई भटकती हुई साँसों में चली आती है काँच के ख्वाब लाती हैं, हिज्र की बिजली लाती है जब भी सुनता … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: ग़म-ए-हस्ती को कोई अज़गार मिल जाये और कुछ नहीं कोई इन्तेज़ार मिल जाये ज़िंदगी साहिलों पर अटकी हुई है अब … more →