क्यों? बेशर्म क़तरा-क़तरा ज़हन नहीं ढलता क्यों? मुझे बेक़रारियों से क़रार नहीं मिलता क्यों? ढल रहा हूँ दिल में ख़ुद के ही, आज! क्यों नहीं हूँ कोशिशे-इश्क़ में, ख़ुद के ही आज? मग़रूर तो हूँ मैं, मजबूर भी हूँ… more →
तख़लीक़-ए-नज़रkmuskan wrote 7 months ago: ज़िन्दगी जाने तू क्या चाहती है जाने किस मोड़ पे मुझे लिए जा रही है मेरे खवाबो ,मेरी तम्मनाओ को पीछ … more →
दीपक भारतदीप wrote 9 months ago: अतीत के गुजरे पल ही दिमाग को इस तरह सताते कि भविष्य के सपने सामने चले आते साथ चलता तो है बस आज का सच … more →
विनय wrote 1 year ago: क्यों? बेशर्म क़तरा-क़तरा ज़हन नहीं ढलता क्यों? मुझे बेक़रारियों से क़रार नहीं मिलता क्यों? ढल रहा हूँ दि … more →
विनय wrote 1 year ago: हाल दिल का बताना तुमसे बहुत ही मुश्किल है न जाने कितना, बेशुमार दर्द इसमें शामिल है हर लम्हा ज़िन्दगी … more →
विनय wrote 1 year ago: मेरी मुहब्बत तो झूठी नहीं अगर मैं झूठा हूँ तुम जो गये हो यहाँ से पल-पल मैं टूटा हूँ किसी का एतबार नह … more →
mehhekk wrote 1 year ago: कोशिश जो भी है वो आज इस पल पता नही क्या लाए आनेवाला कल आज ही करनी है कल के लिए कोशिश आज ही करना … more →
विनय wrote 1 year ago: वह मुझे चाहती है या यूँ ही मुझसे बात करनी थी उसे कोशिश तो उसने मुझ तक पहुँचने की बहुत की थी और फिर व … more →
विनय wrote 1 year ago: तुम्हें महसूस हो कि ना हो मेरे सीने में दर्द है तो सही… लम्हा-लम्हा जज़्बात पिघलते हैं ग़म की चि … more →