देवदतां पतिर्भार्यां विन्दते नेच्छत्यात्मनः। तां साध्वीं बिभृयान्नित्यं दीनां प्रियमाचरन्।। हिंदी में भावार्थ-पुरुष स्वयं की इच्छा ने नहीं वरन् देवताओं द्वारा पूर्व निर्धारित स्त्री को ही पत्नी के रूप… more →
दीपक भारतदीप की ई-पत्रिकादीपक भारतदीप wrote 1 year ago: उनकी गली से निकलते हुए यूं भी हमें डर लगता है कि कहीं हमें देखकर उन्हें वह वादे याद न आयें जो कर वह … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: 1.विशेष ज्ञान से संपन्न सत्त्वगुण और दैव की अनुकूलता लिए उधोग और सत असत का विचार का शत्रु पर उपाय का … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: 1. दूर्भिक्ष और आपत्तिग्रस्त स्वयं ही नष्ट होता है और सेना का व्यसन को प्राप्त हुआ राज प्रमुख युद … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: १.कछुए के समान अंग संकोचकर शत्रु का प्रहार भी सहन करे और बुद्धिमान फिर समय देखकर क्रूर सर्प के समा … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: १.शत्रु को अपने से अधिक जानकर उसके बल के कारण उपेक्षा कर स्थिर ही रहता है उसको उपेक्षासन कहते हैं। ज … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: १. जो पुरुष वाणी में कठोरता दिखाता है उससे लोग उतेजित होते हैं यह अनर्थकारी है, इसलिए ऐसी … more →