दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: बौद्धिक अँधेरे में ज्ञान के चिराग कुछ यूँ बेचे जा रहे हैं सदियों से अपनी जगह खडे बुत भी लोगों को चल … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: मुखों की बैठक में सिंहासन पर मुखोटा रखने का मसला उठा था सबके चेहरे थे दागदार चुनाव के जुए में लोगों … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: उनके इन्तजार में गुजारे कयी बरस जिन्हें कभी हमारी याद न आयी जब वह आये हमारे घर उनका बदल रुप देखकर … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: उसकी तस्वीर देखकर मैं मुस्कराकर रहा हूँ आज संगमरमर के पत्थर से कई हजार मजदूरों के ख़ून पसीने से बना … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: थका हुआ शरीर उदास मन सूनी आँखें और कांपती जुबान पूछते है पता वह सुख और ख़ुशी का ओढ़े हैं लिबास स्वार … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: ताज मोहब्बत की निशानी है जो मरने के बाद निभानी है इसीलिये हर आशिक़ बनाने का वादा करता जाता यह सोचकर क … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: वह कहते है हमारे घर में सांप बहुत निकलते हैं पूरे इलाक़े में है आतंक हाथी और शेर आदमी पर हमला करते … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: वैज्ञानिकों ने आसमान एक धरती का अस्तित्त्व खोज निकाला है, उनके दावों पर … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: क्रीम और पाउडर से पुते चेहरे सौंदर्य का बोध कराते थोडा पसीना में ही नहाते चेहरे की असलियत देखते ही … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: बुरे लोग दोस्त किसी के नहीं होते पर भले भी नहीं होते दोस्त सिर्फ दोस्त जैसे होते हैं जो सत्य सामने … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: राजनीति वह व्यापार है जिसमें गरीबी, बेकारी भ्रष्टाचार और भुखमरी का दर्द बेचा जाता दर्द के इलाज का … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: बोलते तो हर पल हैं कभी खामोशी भी ओढ़ कर देख लो देखते तो हर पल हैं कभी आंख बंद कर भी देख लो सुनते तो … more →