शीशाए-अश्क आते रहे क़तरा-क़तरा लहू रुलाते रहे हम दीवानों की ख़ैर भला कौन पूछे लोग आते-जाते रहे हम रखते हैं दोस्ती का पास हर दफ़ा कोई रखता नहीं बेवजह हम पे लोग ग़लत इल्ज़ाम लगाते रहे हमने सुना था दर्द की मि… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: शीशाए-अश्क आते रहे क़तरा-क़तरा लहू रुलाते रहे हम दीवानों की ख़ैर भला कौन पूछे लोग आते-जाते रहे हम रखते … more →