हमारी आंखें लुप्त हो रही हैं (a poem by ravi kumar, rawatbhata) हम एक अंधेरी खान में जी रहे हैं हम कई घंटों तक रोजी-रोटी की आपाधापी में रहते हैं सोते हैं कई घंटे बाकी समय में खु़द को उलझाए रखने के लिए… more →
सृजन और सरोकाररवि कुमार, रावतभाटा wrote 8 months ago: हमारी आंखें लुप्त हो रही हैं (a poem by ravi kumar, rawatbhata) हम एक अंधेरी खान में जी रहे हैं हम क … more →