एक मुलाक़ात की इल्तजा है उससे दुआ है वह क्यों नहीं मिलता मुझसे उसे क्या शुबा है मुझ मुरीद को न क़रार है यह क्या धुँआ है साँस बदन से जुदा-जुदा है मुझे क्या हुआ है मैं जिसके लिए मरना चाहता हूँ वो मेरा खु़… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 2 years ago: एक मुलाक़ात की इल्तजा है उससे दुआ है वह क्यों नहीं मिलता मुझसे उसे क्या शुबा है मुझ मुरीद को न क़रार ह … more →
विनय wrote 2 years ago: क्या पाया और कितना पाया ज़िन्दगी से हमें कोई गिला नहीं सुना है जितना भी देता है खु़दा जीने के लिए मुन … more →