रजनी जग को सुलाये सहे तिमिर का वार नभ खुश हो पहनाये चांद-तारों का हार बन के खुद आइना रहा रूप को निखार प्यार गंगा की धार भूख सह कर भी मां दर्द से जार-जार तृप्त कर दे शिशु को कैसी खुश हो अपार भर के … more →
हरिहर झाGirijesh Rao wrote 2 months ago: बनारस. गंगा. न जाने ये मुझे अपनी ओर क्यों खींचते से लगते हैं? शायद पिछले जन्म का कोई संबन्ध हो. होटल … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 months ago: रजनी जग को सुलाये सहे तिमिर का वार नभ खुश हो पहनाये चांद-तारों का हार बन के खुद आइना रहा रूप को निखा … more →
योगेन्द्र wrote 5 months ago: आज गणतंत्र दिवस है, साठवां गणतंत्र दिवस । हर बीते वर्ष की तरह मनाया जाने वाला दिवस । अगले वर्ष इसी त … more →
pryas wrote 6 months ago: काशी में गंगा के तट पर एक संत का आश्रम था। एक दिन उनके एक शिष्य ने पूछा, ‘गुरुवर, शिक्षा का नि … more →
प्रेमलता पांडे wrote 8 months ago: गंगोत्री ग्लेशियर से निकली तीनों धाराएँ अलकनंदा, मंदाकिनी और भागीरथी हिमालय की गोद छोड़कर नीचे धाती ह … more →
Grey Rainbow - स्याह इंद्रधनुष wrote 9 months ago: गंगा तुम क्यों जलती हो, क्या उन पापों से जो धोए तुमने ? या देख कर उन पापों को जो होने को तैयार दिलो … more →
Amarjeet Singh wrote 1 year ago: तेरे खुशबु मे बसे ख़त मैं जलाता कैसे, जिनको दुनिया की निगाहों से छुपाये रखा, जिनको इक उम्र कलेजे से … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 1 year ago: रजनी जग को सुलाये सहे तिमिर का वार नभ खुश हो पहनाये चांद-तारों का हार बन के खुद आइना रहा रूप को निखा … more →