दिल पर होने लगा इक अंजाना असर खोने लगी है हर शाम मेरी नज़र गौर से कभी उसको देखा नहीं फिर भी पहचान लूँगा चेहरे हज़ार हों अगर आते-जाते मिल ही जाती है नज़र और थम जाती है दिल की अनबन जो यह बेज़ुबाँ दिल नहीं क… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: दिल पर होने लगा इक अंजाना असर खोने लगी है हर शाम मेरी नज़र गौर से कभी उसको देखा नहीं फिर भी पहचान लूँ … more →
विनय wrote 1 year ago: आ री सखी चलें फिर वहीं जहाँ पहली बार मिले थे जहाँ सपनों की गलियाँ छूटी थीं हक़ीक़त के दरवाज़े खुले थे च … more →