तन्हाई यूँ ढूँढ़ती है मुझे जैसे मेरी सदा तुम्हें जो दीवारें ख़ुद-ब-ख़ुद गिरती हैं मैं कैसे चुनावाऊँ उन्हें मैं बद से बदतर हुआ जाता हूँ याद कर-करके तुम्हें ख़िज़ाँ भी ख़ुशरंग हुई जाती है खुष्क पत्ते पहन… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: तन्हाई यूँ ढूँढ़ती है मुझे जैसे मेरी सदा तुम्हें जो दीवारें ख़ुद-ब-ख़ुद गिरती हैं मैं कैसे चुनावाऊँ … more →