ग़ज़लः३९ यूं उसकी बेवफाई का मुझको गिला न था इक मैं ही तो नहीं जिसे सब कुछ मिला न था. लिपटे हुए थे झूठ से कोई सच्चा न था खोटे तमाम सिक्के थे, इक भी खरा न था. उठता चला गया मेरी सोचों का कारवां आकाश की त… more →
चराग़े-दिलDevi Nangrani wrote 7 months ago: ग़ज़लः३९ यूं उसकी बेवफाई का मुझको गिला न था इक मैं ही तो नहीं जिसे सब कुछ मिला न था. लिपटे हुए थे झू … more →
Devi Nangrani wrote 10 months ago: ग़ज़लः ४१ बहारों का आया है मौसम सुहाना नये साज़ पर कोई छेड़ो तराना. ये कलियां, ये गुंचे ये रंग और खु … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: ग़ज़लः ४० रिश्ता तो सब ही जताते है पर कुछ ही खूब निभाते है. दुख दर्द हैं ऐसे महमां जो आहट के बिन आ … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: ग़ज़लः ३८ कितने आफ़ात से लड़ी हूँ मैं तब तेरे दर पे आ खड़ी हूं मैं. वो किसी से वफ़ा नहीं करता कहता ह … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: ग़ज़लः ३७ तर्क कर के दोस्ती फिरता है क्यों बनके आखिर अजनबी फिरता है क्यों? चल वहां होगी जहां शामे-ग … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: ग़ज़लः३६ कोई षडयंत्र रच रहा है क्या जन्मदाता बना हुआ है क्या? राहगीरों को मिलके राहों पर राह को घ … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: ग़ज़लः ३५ बुझे दीप को जो जलाती रही है यही रौशनी है, यही रौशनी है. जो बेलौस अपने ख़ज़ाने लुटा दे यह … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: ग़ज़लः ३४ बहता रहा जो दर्द का सैलाब था न कम आंखें भी रो रही हैं, ये अशआर भी है नम. जिस शाख पर खड़ा थ … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: ग़ज़लः ३३ ख़ता अब बनी है सजा का फ़साना बताऊँ तुम्हें क्या है दिल का लगाना. हवा में न जाने ये कैसा … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: ग़ज़लः ३२ ये सायबां है जहां, मुझको सर छुपाने दो करम ख़ुदा का है सब पर, वो आज़माने दो. जो दिल के तार … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: गज़लः ३१ अंधेरी गली में मेरा घर रहा है जहां तेल-बाती बिना इक दिया है. जो रौशन मेरी आरजू का दिया है … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: ग़ज़लः ३० जाने क्या कुछ हुई ख़ता मुझसे रूठा वो बे सबब न था मुझसे. जिसको हासिल न कुछ हुआ मुझसे म … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: गज़लः २९ ठहराव जिंदगी में दुबारा नहीं मिला जिसकी तलाश थी वो किनारा नहीं मिला. वर्ना उतारते न समंदर म … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: गजलः २८ वो अदा प्यार भरी याद मुझे है अब तक बात बरसों की मगर कल की लगे है अब तक. हम चमन में ही बसे … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: ग़ज़लः २७ चोट ताज़ा कभी जो खाते हैं ज़ख्मे-दिल और मुस्कराते हैं. मयकशी से ग़रज़ नहीं हमको तेरी आँ … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: गज़लः २६ हमने चाहा था क्या और क्या दे गई ग़म का पैग़ाम बादे-सबा दे गई. ुस्कराहट को होटों से दाबे रक … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: गज़लः२५ ख़्यालों ख़्वाब में ही महफिलें सजाता है. और उसके बाद उदासी में डूब जाता है. वो चाहता … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: ग़ज़लः २४ दिल को हम कब उदास करते हैं आज भी उनकी आस करते हैं. हमको ढूँढो नही मकानों में हम दिलों में … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: गजलः २३ तेरे क़दमों में मेरा सजदा है तुझको अपना खुदा बनाया है. जिसकीी ख़ातिर ख़ता हुई हमसे वो ही इल् … more →