गजलः 41 बहारों का आया है मौसम सुहाना नये साज़ पर कोई छेड़ो तराना. ये कलियां, ये गुंचे ये रंग और खुशबू सदा ही महकता रहे आशियाना. हवा का तरन्नुम बिखेरे है जादू कोई गीत तुम भी सुनाओ पुराना. चलो दोस्ती की… more →
चराग़े-दिलDevi Nangrani wrote 1 month ago: गजलः 41 बहारों का आया है मौसम सुहाना नये साज़ पर कोई छेड़ो तराना. ये कलियां, ये गुंचे ये रंग और खुशब … more →
Devi Nangrani wrote 11 months ago: ग़ज़लः३९ यूं उसकी बेवफाई का मुझको गिला न था इक मैं ही तो नहीं जिसे सब कुछ मिला न था. लिपटे हुए थे झू … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: ग़ज़लः ४१ बहारों का आया है मौसम सुहाना नये साज़ पर कोई छेड़ो तराना. ये कलियां, ये गुंचे ये रंग और खु … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: ग़ज़लः ४० रिश्ता तो सब ही जताते है पर कुछ ही खूब निभाते है. दुख दर्द हैं ऐसे महमां जो आहट के बिन आ … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: ग़ज़लः ३८ कितने आफ़ात से लड़ी हूँ मैं तब तेरे दर पे आ खड़ी हूं मैं. वो किसी से वफ़ा नहीं करता कहता ह … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: ग़ज़लः ३७ तर्क कर के दोस्ती फिरता है क्यों बनके आखिर अजनबी फिरता है क्यों? चल वहां होगी जहां शामे-गज … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: ग़ज़लः३६ कोई षडयंत्र रच रहा है क्या जन्मदाता बना हुआ है क्या? राहगीरों को मिलके राहों पर राह को घर स … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: ग़ज़लः ३५ बुझे दीप को जो जलाती रही है यही रौशनी है, यही रौशनी है. जो बेलौस अपने ख़ज़ाने लुटा दे यही … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: ग़ज़लः ३४ बहता रहा जो दर्द का सैलाब था न कम आंखें भी रो रही हैं, ये अशआर भी है नम. जिस शाख पर खड़ा थ … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: ग़ज़लः ३३ ख़ता अब बनी है सजा का फ़साना बताऊँ तुम्हें क्या है दिल का लगाना. हवा में न जाने ये कैसा नश … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: ग़ज़लः ३२ ये सायबां है जहां, मुझको सर छुपाने दो करम ख़ुदा का है सब पर, वो आज़माने दो. जो दिल के तार … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: गज़लः ३१ अंधेरी गली में मेरा घर रहा है जहां तेल-बाती बिना इक दिया है. जो रौशन मेरी आरजू का दिया है म … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: ग़ज़लः ३० जाने क्या कुछ हुई ख़ता मुझसे रूठा वो बे सबब न था मुझसे. जिसको हासिल न कुछ हुआ मुझसे मौन का … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: गज़लः २९ ठहराव जिंदगी में दुबारा नहीं मिला जिसकी तलाश थी वो किनारा नहीं मिला. वर्ना उतारते न समंदर म … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: गजलः २८ वो अदा प्यार भरी याद मुझे है अब तक बात बरसों की मगर कल की लगे है अब तक. हम चमन में ही बसे थे … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: ग़ज़लः २७ चोट ताज़ा कभी जो खाते हैं ज़ख्मे-दिल और मुस्कराते हैं. मयकशी से ग़रज़ नहीं हमको तेरी आँख … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: गज़लः २६ हमने चाहा था क्या और क्या दे गई ग़म का पैग़ाम बादे-सबा दे गई. ुस्कराहट को होटों से दाबे रक् … more →
Devi Nangrani wrote 2 years ago: गज़लः२५ ख़्यालों ख़्वाब में ही महफिलें सजाता है. और उसके बाद उदासी में डूब जाता है. वो चाहता … more →
Devi Nangrani wrote 2 years ago: ग़ज़लः २४ दिल को हम कब उदास करते हैं आज भी उनकी आस करते हैं. हमको ढूँढो नही मकानों में हम दिलों में … more →