प्रस्तुत है श्री आर. पी. शर्मा “महरिष” के ग़ज़ल संसार की दो चुनिंदा ग़ज़लें प्रेषक : देवी नागरानी ग़ज़ल – १ तर्जुमानी जहान की, की है इस तरह हमने शायरी की है अंधी गलियों में भटके जब जब हम फ… more →
दिल से दिल तकskbahadi wrote 4 months ago: ख्वाब देखता हूँ इसलिए की यह हकीकत नहीं ख्वाइश्मन्द हूँ ख्वाब का हकीकत का नहीं हकीकत देख कर क्या होगा … more →
skbahadi wrote 4 months ago: दीवारें तो रास्ता रोकते हैं फिर ये क्या पूछते हो रास्ता किधर है जंजीरों ने सदा गुलामी दी है फिर ये क … more →
skbahadi wrote 4 months ago: मैंने तुझको चाहा ये महसुस तुने भी किया होगा एक बार ही सही तेरा दिल मेरे लिए धड़का तो होगा दुनिया में … more →
skbahadi wrote 4 months ago: दास्ताँ अपनी देख हैरान होता हूँ जहाँ में कैसे हँसतें हैं लोग परेशां होता हूँ गुजरते वक़्त ने क्या क् … more →
skbahadi wrote 4 months ago: खड़े रहे उस मोड़ पर जिसका तुमसे जिक्र था कभी इस तरफ कभी उस तरफ हर राह पर निगाह था तुम आओगे खिचे खिचे … more →
skbahadi wrote 6 months ago: ढूँढता हूँ कोई हसीं हमदर्द जो दिल को करार दे जायेगी कभी इस गली कभी उस गली दिल की बेकरारी हमें कहाँ ल … more →
skbahadi wrote 6 months ago: ये रंजिशें और ये ग़म अब और सहा न जाये ये ज़िन्दगी अब और, अब और जिया न जाये तुम जो कर गए हो अश्को को … more →
skbahadi wrote 6 months ago: मेरे लबों पर एक आह अगर होता मेरे जलने का गुमां हर किसी को होता मेरे कहकहों में एक कशमकश है काश की ये … more →
skbahadi wrote 6 months ago: ये भी तू छीन गया अब और ज़िन्दगी में बचा क्या है आखिर इस दर्द की दवा क्या है तुम्हारी बातों का बहुत क … more →
skbahadi wrote 6 months ago: विरानियाँ है पसरा कौन जाने कोई गुजरा भी इधर से किधर है आखिर काफ़िला पुछूं यहाँ मैं किस से हर चंद एक त … more →
skbahadi wrote 6 months ago: उन्हें ये शिकायत की हम कुछ नहीं कहते मेरा ये कहना की वो सुनने का हौसला न रखते ख़ुद को बहलाने का कुछ य … more →
skbahadi wrote 6 months ago: ये जो मैं हूँ तो क्या हूँ न दवा हूँ न ज़हर हूँ ये जो मैं हूँ तो कहाँ हूँ न यहाँ हूँ न वहां हूँ ये जो … more →
skbahadi wrote 6 months ago: मैं तो हूँ हर लम्हों का मारा कहाँ है कश्ती कहाँ किनारा घर में एक चिराग जलाया औरों का दिल हुआ पराया अ … more →
skbahadi wrote 6 months ago: तन्हा तन्हा अब तलक यूँ जीते रहे अब किसी से दिल लगाना चाहता हूँ मुस्कुराने का बहाना चाहता हूँ कहने को … more →
skbahadi wrote 7 months ago: मिले न फूल तो काँटों से दोस्ती कर ली ये ज़िन्दगी, कितनी बेबस ज़िन्दगी कर ली अलग – अलग है मेरे … more →
skbahadi wrote 7 months ago: इतना तो पता की है तेरा शहर यही है पर मालूम नहीं तेरी गली किधर है अजनबी हैं ये शहर अजनबी हैं ये रास्त … more →
skbahadi wrote 7 months ago: दर्द कुछ इतने सहे की अब दर्द का कुछ पता नहीं रंजिशें हमने इतनी सहीं, एक रंजिश और सही अन्धकार में थे … more →
Maheep Saraf wrote 7 months ago: खोया खोया हूँ कई दिनों से, किस वज़ह से मुझे पता नहीं घना अंधेरा छाया हे नभ में, पर दिखती कोई घटा नही … more →
Maheep Saraf wrote 8 months ago: बस एक बार बता दे ग़लती मेरी, चाहे फिर कभी बात ना हो मुस्करा दे एक बार अब तो, इस तरह मुझसे नाराज़ ना … more →