तेरी तीरे-नज़र किस अदा से यार उठती है रह-रहकर रुक-रुककर बार-बार उठती है हम बीमारि-ए-इश्क़ के मारे हुए हैं और तेरी नज़र पैनी हो कर बार-बार उठती है नाज़ो-नख़्वत1 के पैमाने किस तरह उठाऊँ नज़र उठती है तो ज़िबह2… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 9 months ago: तेरी तीरे-नज़र किस अदा से यार उठती है रह-रहकर रुक-रुककर बार-बार उठती है हम बीमारि-ए-इश्क़ के मारे हुए … more →
विनय wrote 2 years ago: हमने अबस की आरज़ू छोड़ दी तुमको पाने की जुस्तजू छोड़ दी चाक़ जिगर को गरेबाँ में छिपाके हमने हसरते-रफ़ू … more →