“आदमी गर आदमी”***प्रभाकर***(मेरे अँकल द्वारा लिखी एक और गज़ल) आदमी गर आदमी को ही न जाने लगे खुदा की ज़ात को वो कैसे पहचाने लगे तेरी रहमत ने बदल डाले रुख रिन्दों के मयखाना छोड अब तो शिवाले जा… more →
हँसते रहोराजीव् तनेजा wrote 2 years ago: “आदमी गर आदमी”***प्रभाकर***(मेरे अँकल द्वारा लिखी एक और गज़ल) आदमी गर आदमी को ही न जाने ल … more →
राजीव् तनेजा wrote 2 years ago: “मेरे ख्यालों में” ***प्रभाकर*** (मेरे अंकल द्वारा लिखी गयी एक गज़ल) मेरे ख्यालों को बुल … more →