तेरी तीरे-नज़र किस अदा से यार उठती है रह-रहकर रुक-रुककर बार-बार उठती है हम बीमारि-ए-इश्क़ के मारे हुए हैं और तेरी नज़र पैनी हो कर बार-बार उठती है नाज़ो-नख़्वत1 के पैमाने किस तरह उठाऊँ नज़र उठती है तो ज़िबह2… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 4 months ago: तेरी तीरे-नज़र किस अदा से यार उठती है रह-रहकर रुक-रुककर बार-बार उठती है हम बीमारि-ए-इश्क़ के मारे हुए … more →
विनय wrote 6 months ago: जो मुझे होता है वह दर्द तुझ तक पहुँचे यूँ इस ख़ला की यह गर्द तुझ तक पहुँचे की है इस दिल ने सदा तुझसे … more →
दीपक भारतदीप wrote 11 months ago: लुट जाने का खतरा अब गैरो से नहीं सताता अपनों को ही यह काम अच्छी तरह अब करना आता पहरेदारी अपने घर की … more →
विनय wrote 1 year ago: दिल के ख़ाब दिल में ही सुलगते हैं हक़ीक़त के निशाँ अभी दूर लगते हैं हल्की-हल्की आवाज़ें कानों में गुनगु … more →