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Blogs about: चित्रावली

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छवि ७. आईना अक्स

Devi Nangrani wrote 1 year ago: छवि ७. आईना अक्स द्रश्य मेरे जीवन का सामने मेरे खडा़ ऐसे जैसे आईना और अक्स बाल अवस्था, काट जवानी हरी … more →

छवि ६. रूह के लिये

Devi Nangrani wrote 1 year ago:   छवि ६. रूह के लिये रूह के लिये कोई कै़द नहीं है बस, इस पिंजर शरीर की सलाखें उसे बाँधे हुए है बंधन … more →

छवि ५: मँजिल तेरी दूर

Devi Nangrani wrote 1 year ago: मुसाफिर मंजि़ल तेरी दूर जाना बहुत ज़रूर….मुसाफिर॥ लंबा रस्ता, कदम है भारी तन है चकनाचूर… … more →

छवि ४. दस्तक दे रहा है1 comment

Devi Nangrani wrote 1 year ago: दस्तक दे रहा है वातावरण मौन बाहर शोर विपरीत उसके वह लीन है आँखें मूँदे बाहर अंदर की वह खोल रहा है को … more →

छवि ३. सँगम

Devi Nangrani wrote 2 years ago:       “मौत की गोद में ज़िंदगी आबाद अब हो रही” खोखला जिस्म खोखली साँसें पर … more →

छवि २:. साथी‍‌2 comments

Devi Nangrani wrote 2 years ago:       तन के साथी, मन के साथी मिलकर बोझ उठाएँगे मेहनत मजदूरी को दोनों अपना ध्येय बनाएँ … more →

छवि १. कण कण में

Devi Nangrani wrote 2 years ago:   छवि १. कण कण में रेतीले कण कण में इस वीरान दायरे के अंदर खामोशी का दुशाला ओढे़ खड़ा है यकटक प … more →

छवि १. कोई तो आएगा6 comments

Devi Nangrani wrote 2 years ago: छवि १. कोई तो आएगा सूनी सी पगडंडी पर, इक आस अभी भी साँस ले रही है आँखो में निर्जीव सी आशा बुझ कर फिर … more →


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