छवि ७. आईना अक्स द्रश्य मेरे जीवन का सामने मेरे खडा़ ऐसे जैसे आईना और अक्स बाल अवस्था, काट जवानी हरी भरी जो धानी धानी अब पतझड़ में तन्हा तन्हा खडा हुआ बिन दाना पानी मूक, निराधार पर मन में इक आस लिए … more →
चराग़े-दिलDevi Nangrani wrote 1 year ago: छवि ७. आईना अक्स द्रश्य मेरे जीवन का सामने मेरे खडा़ ऐसे जैसे आईना और अक्स बाल अवस्था, काट जवानी ह … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: छवि ६. रूह के लिये रूह के लिये कोई कै़द नहीं है बस, इस पिंजर शरीर की सलाखें उसे बाँधे हुए है बंध … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: मुसाफिर मंजि़ल तेरी दूर जाना बहुत ज़रूर….मुसाफिर॥ लंबा रस्ता, कदम है भारी तन है चकनाचूर … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: दस्तक दे रहा है वातावरण मौन बाहर शोर विपरीत उसके वह लीन है आँखें मूँदे बाहर अंदर की वह खोल रहा … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: “मौत की गोद में ज़िंदगी आबाद अब हो रही” खोखला जिस्म खोखली साँसें … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: तन के साथी, मन के साथी मिलकर बोझ उठाएँगे मेहनत मजदूरी को दोनों अपना ध्येय बनाए … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: छवि १. कण कण में रेतीले कण कण में इस वीरान दायरे के अंदर खामोशी का दुशाला ओढे़ खड़ा है यकट … more →
Devi Nangrani wrote 1 year ago: छवि १. कोई तो आएगा सूनी सी पगडंडी पर, इक आस अभी भी साँस ले रही है आँखो में निर्जीव सी आशा बुझ कर … more →