चटनी आमा के (छत्तीसगढ़ी रचना) नंगत ले बइहाये मऊर, ए दे पर बर लटलट ले फर गे। देस के भुंइया ला अमरे बर, आमा के डारा निहरगे।। मंदरस किरवा कस लइकन झूमगे, देख आमा के कयरी। जमदूत कस मुछर्रा रखवार, हावय ननमु… more →
Tularamdewangan's Blogtularamdewangan wrote 9 months ago: चटनी आमा के (छत्तीसगढ़ी रचना) नंगत ले बइहाये मऊर, ए दे पर बर लटलट ले फर गे। देस के भुंइया ला अमरे बर … more →
tularamdewangan wrote 9 months ago: कुम्हार के कुम्हारी- सम्पूर्ण (छत्तीसगढ़ी रचना) अहो भाग छत्तीसगढ़, तंय बाढ़ गे अड़बड़। बिसरागे माटी … more →
tularamdewangan wrote 9 months ago: जोरय जिनगी के खेल मं (छत्तीसगढ़ी रचना) जनम के नंगरा, जुगुर-जागर, बुग-बाग, सूजी जिव परहा। धरिस गुन गा … more →
tularamdewangan wrote 9 months ago: कल्पवृक्छ तोर नांव (छत्तीसगढ़ी रचना) कल्पवृक्छ तोर नांव। जाचक हें, जम्मों जगवासी, कहॉं तोर हे ठांव। … more →