इक औरत की िजंदगी गुजर जाती ह,ै मुिशकलो से जुझने मे कभी अपने हक के िलए तो, कभी अपने आसिततव के िलए कभी अपने िलए तो, कभी अपनो के िलए। बचपन से जवानी, जवानी से बुढापा जुझती रहती है औरत कभी- कभी तो इस दुिनय… more →
कुछ िदल सेkmuskan wrote 1 year ago: इक औरत की िजंदगी गुजर जाती ह,ै मुिशकलो से जुझने मे कभी अपने हक के िलए तो, कभी अपने आसिततव के िलए कभी … more →
kmuskan wrote 1 year ago: मेरे होठो की मुस्कान देखकर गर वो समझते है की मैं खुश हूँ तो उन्हें इसी गलतफहमी मे खुश होने दो कल उ … more →
विनय wrote 1 year ago: उफ़! यह छाँव की उमस तौबा यह झूठे फ़साने उम्मीद की धूप रिस गयी है शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’ लेखन वर्ष: … more →
विनय wrote 1 year ago: मैं तेरे इश्क़ की छाँव में जल-जलकर कितना काला पड़ गया हूँ, आकर देख तू मुझे हुस्न की धूप का एक टुकड़ा … more →