जानते हैं दर्द बुझते हुए चाँद का जब बढ़ते आते हैं सुबह के क़दम जुस्त-जू की छाया खो जाती है कहीं चाँद से बिछड़कर तन्हा हुए हम तेरा एहसास था कभी दिल के पास तू क्यूँ तोड़ गया जीने की हर आस नहीं थी उन गुलो… more →
तख़लीक़-ए-नज़रदीपक भारतदीप wrote 11 months ago: हंसने की चाहत है जिसमें उसे चुटकुले सुनने का इंतजार नहीं होता अपनी करतूतों में ही छिपे होते है हंसने … more →
विनय wrote 1 year ago: जानते हैं दर्द बुझते हुए चाँद का जब बढ़ते आते हैं सुबह के क़दम जुस्त-जू की छाया खो जाती है कहीं चाँद … more →