एक दिन मैं अपने एक मित्र के साथ खड़ा था तो एक सज्जन वहां आये। उस समय मैं और मेरे मित्र अखबारों मे छपी किसी खबर पर चर्चा कर रहे थे। बातों ही बातों मे सज्जन बोले-‘‘अरे यार, आजकल अखबारों में भी मजा नहीं … more →
दीपक भारतदीप की शब्द- पत्रिकाSatish Chandra satyarthi wrote 7 months ago: कुछ धुआँ कुछ लपटें कुछ कोयले कुछ राख छोड़ता चूल्हे में लकड़ी की तरह मैं जल रहा हूँ, मुझे जंगल की याद … more →
pryas wrote 10 months ago: कल ऑफिस के काम से बाहर जाना था. गार्ड को बोला की ड्राईवर को गाडी निकालने के लिये कह दे. कोई दो बजे ख … more →
khojikhabariya wrote 1 year ago: बस्तर में इन दिनो किसी न किसी बहाने जंगल सफाया करने का काम धङल्ले से जारी है,कंही वैध(?)तो कंही अवै … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: एक दिन मैं अपने एक मित्र के साथ खड़ा था तो एक सज्जन वहां आये। उस समय मैं और मेरे मित्र अखबारों मे छप … more →
cpimlnd wrote 1 year ago: - आशीष भारतीय समाज काफी प्राचीन है जिसका जन समुदाय विभि जातियों में विभाजित रहा है। समाज की जातीय रू … more →
विनय wrote 1 year ago: गिर जायेगा इस बरसात में घर तुम हो उधर हम हैं इधर जंगल ही जंगल है सब वीराना-सा जिस सिम्त दौड़ती है नज़ … more →
विनय wrote 1 year ago: मैं वो आग हूँ जो लग जाऊँ तो जंगल का तिनका-तिनका जला दूँ फैल जाऊँ चंद लम्हों में कुछ इस तरह जैसे आग क … more →