“सखी मोरि नींद नसानी हो पिय को पंथ निहारत सगरी रैना बिहानी हो। सखियन मिलकर सीख दई मन, एक न मानी हो। बिन देख्यां कल नाहिं पड़त जिय, ऐसी ठानी हो। अंग-अंग ब्याकुल भई मुख, पिय पिय बानी हो।” कर… more →
वर्ड प्रेस पर आलसीअफ़लातून wrote 6 months ago: मैंने जब हिन्दी में ब्लॉगिंग शुरु की उस समय से इस समय की कुछ दशा ही और है ! वैचारिक मतभेद तब भी थे ल … more →