एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार (सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव) कात्यायनी, सत्यम दलित-प्रश्न पर सही रुख अपनाओ! दलित-प्रश्न पर सही रुख अपनाए बि… more →
नया सर्वहारा पुनर्जागरण नया सर्वहारा प्रबोधनNishant wrote 1 day ago: विद्यारम्भ से पहले एक शिष्य अपने गुरु से सभागार में वार्तालाप करने के लिए आया. वह हर बात के बारे में … more →
Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar wrote 3 weeks ago: एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार (सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत … more →
Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar wrote 1 month ago: “कोट, कपड़ा, आदि उपयोग-मूल्य, अर्थात पण्यों के ढांचे, दो तत्त्वों के योग होते हैं – पदार् … more →
Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar wrote 1 month ago: यह किस्सा नहीं किताबों का यह खेल नहीं दस्तूरों का, एक मई इतिहास बना है दुनिया के मज़दूरों का। एक मई … more →
Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar wrote 1 month ago: कार्ल मार्क्स फ्रेडरिक एंगेल्स विज्ञान के इतिहास में मार्क्स ने जिन महत्त्वपूर्ण बातों का पता लग … more →
ambuj wrote 2 months ago: कुछ दिन पहिले मनोज तिवारी के एगो गाना आइल रहे, “चलल कर ये बबुनी वोढ्नी संभाल के” ! मतलब … more →
Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar wrote 4 months ago: आपस की बात मजदूर भाइयो, मैं अभी कुछ दिनों से ही फैक्ट्री में काम करने लगा हूँ, किंतु इतने में ही मैं … more →
SaritaArun wrote 5 months ago: जीवन में प्रगति के लिये सिर्फ दो चीजें जरूरी हैं: एक गलतियां करना और दूसरे उनसे सीख लेना. There are … more →
ambuj wrote 6 months ago: कभी पलकों पे आंसू आते हैं तो कभी लब थरथराते हैं, कभी दिल में बेचैनी होती है तो कभी साँसे थम सी … more →
kmuskan wrote 9 months ago: ज़िंदगी की भाग-दोड में जाने वो पल कहाँ खो गए जब कुछ पल बैठ कर चैन से बतिया लिया करते थे एक चाए के प … more →
दीपक भारतदीप wrote 9 months ago: हीरा तहां न खोलिए,जहां खोटी है हाट कसि करि बांधो गठरी, उठि चालो बाट संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं … more →
shaifaly wrote 11 months ago: ज़िंदगी के घर में जब भी झाँककर देखते हैं, तो आँगन में सुख मिट्टी में खेलता नज़र आता है। ममता उसे डाँट … more →
अजीत कुमार मिश्रा wrote 1 year ago: क्या भरोसा जीवन का, एक बुलबुला है, न जाने कब टूट जाये कब तक सलामत है। यह पंक्तियां कभी किसी साधु महर … more →
विनय wrote 1 year ago: जिगर को चाक करना चाहता हूँ साँसों में दर्द भरना चाहता हूँ गीली आँखों में सच्चे अफ़साने ऐसे जीवन से डर … more →
विनय wrote 1 year ago: वह मौसम इक बार फिर सजा दे प्यार करने की मुझको सज़ा दे दीवानों की तरह तुझको देखे जाऊँ हाथों की लकीरों … more →
विनय wrote 1 year ago: जब साँसों में समायी नयी सुगन्ध जब मिले पत्तों को लाल-हरे रंग जब आया जीवन में मेरे बसंत जब तन-मन में … more →
विनय wrote 1 year ago: अम्बर में जब चाँद खिला उस पल से चला जानाँ एक नया सिलसिला मुहब्बत भरी वादियों में इक नया गुल खिला तुम … more →
विकास परिहार wrote 1 year ago: आज यूं ही घूमते-घूमते एक बढ़ई के घर के सामने से निकल रहा था। मैने देख कि वो एक खुर्दुरी लकड़ी पर लगाता … more →
विकास परिहार wrote 1 year ago: वर्तमान मानव अपने को कई तरह के तरह के भय से जकड़ा हुआ पाता है जैसे असफलता का भय, असुरक्षा का भय इत्या … more →