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Blogs about: जीवन

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प्रकृति और जीवन प्रशिक्षण का इतिहास2 comments

Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar wrote 2 weeks ago: कड़ी जोड़ने के लिए देखें : . प्रकृति और जीवन पद्धति जिस प्रकार लोग पृथ्वी पर फैलते गए उसी प्रकार पृथ् … more →

Tags: नव सर्वहारा पुनर्जा, नव सर्वहारा प्रबोधन, विरासत, Anthropology, पहरावा, संस्कृति, समाज और संस्कृति

कुदरत तेरे रुप अनेक १८1 comment

premlatapandey wrote 1 month ago: पानी है, जीवन है, शांति है, आकर्षण है! … more →

Tags: चित्राभिव्यक्ति

वाचा - Covenant

the3rdone wrote 2 months ago: वाचा बांधने के लिए दो जन का ज़रुरी है. एक आदमी दुसरा आदमी के साथ वाचा बांधता है और एक दुसरे को कुछ श … more →

Tags: beginners, God, Jesus, Spirit, life, मुक्ति और उद्धार, पश्चाताप, मार्गदर्शन, मुक्ति, यीशु, विश्वास

असमंजस-हिंदी लघुकथा (hindi lagu katha)1 comment

दीपक भारतदीप wrote 3 months ago: पिता ने अपनी पूरी जिंदगी छोटी दुकान पर गुजारी और वह नहीं चाहते थे कि उनका पुत्र भी इसी तरह अपनी जिंद … more →

Tags: writing, हिन्दी, inglish, अभिव्यक्ति, चिन्तन, सूचना, हास्य व्यंग्य, अनुभूति, Internet

संघर्षों का जीवन ये उस दिन पूरा हो जाएगा 1 comment

Nidhi KM wrote 4 months ago: नन्ही, कोमल सी, पंख पसारे, उड़ती थी  स्वछ्न्द गगन मे, हवाए ठंडी लगती थी, नील गगन दिखता था, ना कोई डर … more →

Tags: कविताएँ, जीना, संघर्षों, हिंदी कविता, nablopomo09, nidhi, Pain, Poem

जीवन का अर्थ4 comments

Nishant wrote 4 months ago: विद्यारम्भ से पहले एक शिष्य अपने गुरु से सभागार में वार्तालाप करने के लिए आया. वह हर बात के बारे में … more →

Tags: अन्य कथाएँ

दलित-प्रश्न और स्त्री-प्रश्न पर सही रुख अपनाओ!

Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar wrote 5 months ago: एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार (सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत … more →

Tags: समाजवाद, नव सर्वहारा पुनर्जा, नव सर्वहारा प्रबोधन, मार्क्सवाद, संघर्ष, Marxism, कविता, उदारीकरण, वर्ग चेतना

इस युग का प्रधान वैषम्य : जनतन्तर कथा (34) की हिफाजित में 10 comments

Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar wrote 6 months ago: “कोट, कपड़ा, आदि उपयोग-मूल्य, अर्थात पण्यों के ढांचे, दो तत्त्वों के योग होते हैं – पदार् … more →

Tags: उत्पादक शक्तियां, उत्पादन के संबंध, नव सर्वहारा पुनर्जा, नव सर्वहारा प्रबोधन, प्रतिबद्ध, मार्क्सवाद, विचारणीय : मीडिया से, साम्राज्यवाद, Marxism

मई दिवस

Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar wrote 6 months ago: यह किस्सा नहीं किताबों का यह खेल नहीं दस्तूरों का, एक मई इतिहास बना है दुनिया के मज़दूरों का। एक मई … more →

Tags: सर्वहारा, संघर्ष, विरासत, कविता, सर्वहारा का संगीत, वर्ग चेतना

कार्ल मार्क्‍स के जन्मदिन (5 मई) के अवसर पर 1 comment

Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar wrote 6 months ago: कार्ल मार्क्‍स फ्रेडरिक एंगेल्स विज्ञान के इतिहास में मार्क्‍स ने जिन महत्त्वपूर्ण बातों का पता लगाक … more →

Tags: बिगुल, क्रांति, कम्युनिस्ट, समाजवाद, सर्वहारा, नव सर्वहारा पुनर्जा, नव सर्वहारा प्रबोधन, पूंजीवादी संकट, मार्क्सवाद

चलल कर ये बबुनी ओढ़नी संभाल के1 comment

ambuj wrote 7 months ago: कुछ दिन पहिले मनोज तिवारी के एगो गाना आइल रहे, “चलल कर ये बबुनी वोढ्नी संभाल के” ! मतलब … more →

Tags: गाँव, समाज, bhojpuri, धर्म, लईका, लड़की, dharm, Gaon, Jeevan

तनख्वाह का सच

Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar wrote 9 months ago: आपस की बात मजदूर भाइयो, मैं अभी कुछ दिनों से ही फैक्ट्री में काम करने लगा हूँ, किंतु इतने में ही मैं … more →

Tags: विचारणीय : मीडिया से, क्रांति, ललकार, आंदोलन, कम्युनिस्ट, समाजवाद, सर्वहारा, मार्क्सवाद, संघर्ष

प्रगति के लिये सिर्फ दो चीजें जरूरी

SaritaArun wrote 10 months ago: जीवन में प्रगति के लिये सिर्फ दो चीजें जरूरी हैं: एक गलतियां करना और दूसरे उनसे सीख लेना. There are … more →

Tags: प्रगति

~~ कभी पलकों पे आंसू ~~1 comment

ambuj wrote 11 months ago:  कभी पलकों पे आंसू आते हैं तो कभी लब थरथराते हैं, कभी दिल में बेचैनी होती है तो कभी साँसे थम सी जाती … more →

Tags: Kavita, Poem, कविता, हिन्दी कविता, पलक, कभी आंसू, बेचैनी, Hindi Poem, उम्मीद

जाने वो पल कहाँ खो गए8 comments

kmuskan wrote 1 year ago: ज़िंदगी की भाग-दोड में जाने वो पल कहाँ खो गए जब कुछ पल बैठ कर चैन से बतिया लिया करते थे एक चाए के प्य … more →

Tags: Zindagi, Kavita, muskan, hindi, Poetry, kala, Blogroll, पल, चाँद

संत कबीर संदेशः खोटी मनोवृत्ति के लोगों के सामने अपने रहस्य न खोलें

दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: हीरा तहां न खोलिए,जहां खोटी है हाट कसि करि बांधो गठरी, उठि चालो बाट संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं … more →

Tags: हिन्दी, abhivyakti, Internet, Kabir, Friends, dharm, dohe, hindu, bharat

कुएँ का मेंढक (जीवन के रंगमंच से...... )

shaifaly wrote 1 year ago: ज़िंदगी के घर में जब भी झाँककर देखते हैं, तो आँगन में सुख मिट्टी में खेलता नज़र आता है। ममता उसे डाँट … more →

Tags: जीवन के रंगमंच से, रंगमंच, जिजीविषा, शैफाली

भरोसा जीवन का

अजीत कुमार मिश्रा wrote 1 year ago: क्या भरोसा जीवन का, एक बुलबुला है, न जाने कब टूट जाये कब तक सलामत है। यह पंक्तियां कभी किसी साधु महर … more →

Tags: मल्टी लेवल मार्केटि, जिंदगी

जिगर को चाक करना चाहता हूँ

विनय wrote 1 year ago: जिगर को चाक करना चाहता हूँ साँसों में दर्द भरना चाहता हूँ गीली आँखों में सच्चे अफ़साने ऐसे जीवन से डर … more →

Tags: मेरी ग़ज़ल, इश्क़, दर्द, Heart, Love, दिल, प्यार, मोहब्बत, Pain


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