जब से भूल जाना चाहा तुमको तेरी याद और भी आती है सपना क्या कभी कोई ऐसा हुआ जो बिखरा नहीं बची राख को आँधी मेरी कब्र तक उड़ा ले जाती है तुम फिर क्यों मेरी निगाहों में भर आये आँसू क्या कोई दर्द हुआ दिल मे… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: जब से भूल जाना चाहा तुमको तेरी याद और भी आती है सपना क्या कभी कोई ऐसा हुआ जो बिखरा नहीं बची राख को आ … more →
विनय wrote 1 year ago: महफ़िले-उश्शाक़ में आशिक़ हम-सा न पाओगे बेकार की बातें हैं सभी दिल को कब तक जलाओगे सहर में शुआ शाम को म … more →
विनय wrote 1 year ago: ‘नज़र’ वो नज़र जो लग जाये तो तबाह कर दे अपनी पे आये तो हर इक अदू को बरबाद कर दे उसका तैशो … more →