यादों का सागर गहरा है उसमें डूब जाऊँ तो वक़्त का हर लम्हा ठहरा है कोई काँटा-सा है जो लग गया है इक फाँस-सा है और फँस गया है कोई आवाज़ हमें देता नहीं क्या वो मकान वीराँ हो गया है क्या शाखों पर गुल खिलते न… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 2 years ago: यादों का सागर गहरा है उसमें डूब जाऊँ तो वक़्त का हर लम्हा ठहरा है कोई काँटा-सा है जो लग गया है इक फाँ … more →