जैसे ज़िन्दगी वीरान है जैसे ज़िन्दगी बेनाम है तू मेरी बाँहों से दूर है तू निगाहों का नूर है, मेरे लिए जैसे चलती है धड़कन जैसे होती है कम्पन जैसे आती है यह सुबह जैसे जाती है हर शाम, मेरे लिए घड़ी-घड़ी ते… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: जैसे ज़िन्दगी वीरान है जैसे ज़िन्दगी बेनाम है तू मेरी बाँहों से दूर है तू निगाहों का नूर है, मेरे लिए … more →
विनय wrote 1 year ago: दिल से मेरे जो पहली नज़्म निकली थी वह तेरे लिए थी सखी वह तेरे लिए थी तेरे मेरे ख़ाबों की ज़मीं पर सखी … more →