भ्रान्तं देशमनेकदुर्गविषमं प्राप्तं न किंचित्फलं त्यकत्वा जातिकुलाभिमानमुचितं सेवा कृता निष्फला। भुक्तं मानिववर्जितं परगुहेध्वाशंक्या काकवततृष्णे दुर्गतिपापकर्मनिरते नाद्यापि संतुष्यसि ।। हिंदी में भा… more →
***दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका*** ***Deepak Bharatdeep ki Hindi patrika***दीपक भारतदीप wrote 6 months ago: नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि ————————- हर्त ज्ञार् … more →
दीपक भारतदीप wrote 6 months ago: भ्रान्तं देशमनेकदुर्गविषमं प्राप्तं न किंचित्फलं त्यकत्वा जातिकुलाभिमानमुचितं सेवा कृता निष्फला। भुक … more →
दीपक भारतदीप wrote 7 months ago: राजा भर्तृहरि कहते हैं कि —————– भ्रान्तं देशमनेकदुर्गविषमं प्रा … more →