पसेज़ुल्मत कोई सूरज हमारी ताक में है इसी उम्मीद का दम अब हमारी ख़ाक में है नहीं है ख़ौफ़ किसी ज़ुल्म का हमें यारों आओ देखें के जिगर कितना उस सफ़्फ़ाक में है जो बदलती है रवानी तो बदल ले कौसर रुख़ बदलने का हुनर… more →
इक शायर अंजाना सा...Rohit Jain wrote 5 months ago: पसेज़ुल्मत कोई सूरज हमारी ताक में है इसी उम्मीद का दम अब हमारी ख़ाक में है नहीं है ख़ौफ़ किसी ज़ुल्म का ह … more →