कल्पवृक्छ तोर नांव (छत्तीसगढ़ी रचना) कल्पवृक्छ तोर नांव। जाचक हें, जम्मों जगवासी, कहॉं तोर हे ठांव। कल्पवृक्छ……… दधिचि असन पंचांग के दानी, कभू न हांत पसारे। बिन रेंगे, तोर गुजर-बसर ह… more →
Tularamdewangan's Blogरविकुल wrote 4 months ago: शहीदों के जिस्म पर लगेंगे कब तलक जख्म गहरे, कब तक बैठे रहेंगे निर्वाक लगाए सोच पर पेहरे, निर्दोश लहू … more →
tularamdewangan wrote 9 months ago: कल्पवृक्छ तोर नांव (छत्तीसगढ़ी रचना) कल्पवृक्छ तोर नांव। जाचक हें, जम्मों जगवासी, कहॉं तोर हे ठांव। … more →