वो नहीं क़ातिल ये तो खंजर की ख़ता थी वो कहाँ बदले मेरी नज़र की ख़ता थी उस ही की दीवारें ज़रा मजबूत नहीं थीं आंधी में जो गिरा तो ये उस घर की ख़ता थी कटना ही था इसे यही दस्तूर-ए-जहां है ये क्यों नहीं झुका ये … more →
इक शायर अंजाना सा...Rohit Jain wrote 1 year ago: वो नहीं क़ातिल ये तो खंजर की ख़ता थी वो कहाँ बदले मेरी नज़र की ख़ता थी उस ही की दीवारें ज़रा मजबूत नहीं थ … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: बस एक बार मिली थी नज़र, देखो अब आया होश हमें कुछ और जी लेते खवाबों में, यूँ बेसबब आया होश हमें हाल-ए- … more →