आज भी थोड़ा सा पढ़ के छोड़ दिया है ज़िंदगी का एक और सफ़हा मोड़ दिया है आज फिर सोचा के चुन लूँ ख़ार कुछ नये आज फिर ड़ाली को छू के छोड़ दिया है अब वो नहीं आते हैं ना आवाज़ आती है उस आखरी उम्मीद को भी छोड़ दिया है … more →
इक शायर अंजाना सा...Rohit Jain wrote 1 year ago: आज भी थोड़ा सा पढ़ के छोड़ दिया है ज़िंदगी का एक और सफ़हा मोड़ दिया है आज फिर सोचा के चुन लूँ ख़ार कुछ नये … more →