Blogs about: दर्द बांटते चलो

गुरु-चेला और क्रिकेट 1 comment

दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: गुरु चेले जंगल से निकल कर शहर के मुख्य बाजार में आये, तो देखा सब जगह लोग मूर्तियों की तरह खडे थे. ब … more →

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आदमी अपने सच से मूँह छिपाता है

दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: उगते  सूरज को करें सभी नमन डूबते से कभी नजर न मिलाएं   कामयाबी के शिखर पर पहुँचा आदमी अपने  चारों और … more →

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मन के बहरों के आगे क्या बीन बजाना-hasya kavita

दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: अपनी-अपनी सब कहैं सुने न कोई किसी की बात इससे तो अच्छा हैं हम मौन हो जाये अपने ही मन की सुने बात … more →

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ज्ञान के चिराग कुछ यूँ बेचे जा रहे हैं

दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: बौद्धिक अँधेरे में ज्ञान के चिराग कुछ यूँ बेचे जा रहे हैं सदियों से अपनी जगह खडे बुत भी लोगों को चल … more →

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मय का मायाजाल

दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: जब पीते थे तो कोई बुलाता नहीं था मांगते थे तो कोई पिलाता नहीं था जब छोड़ दीं तो सब बुलाते हैं जैसे म … more →

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हर चमकने वाली चीज हीरा नहीं होती

दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: क्रिकेट,फिल्म,राजनीति और और पत्रकारिता का क्षेत्र समाज में आकर्षण का केंद्र होते हैं । यही नहीं जिन … more →

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अपने धर्म पर अटल रहना

दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: दोस्त हम ऐसा चाहें जो वक्त पर काम आये पर कितना सोचते हैं कि हम दोस्तो के काम आयें ऊपर से लेकर नीचे … more →

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उन्हें सात पीढ़ियों की रोटी पकानी है

दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: उनकी सोच है कि इधर लगाओ या उधर कहीं भी बस आग लगाओ किसी तरह अपनी रोटी पकाओ इन्सान को इन्सान से रगड़ क … more →

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मैं क्यों लिखता हूँ-अपना विचार

दीपक भारतदीप wrote 2 years ago:                    मैं क्यों लिखता हूँ , मुझे नहीं मालुम ! अब सवाल भी अपने से है जवाब भी स्वयं ही दे … more →

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कभी बेवजह दया करना सीखा होता

दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: सीमेंट और कंक्रीट से बने बुतों को हसरत भरी निगाहों से देखे बिना अपनी राह चले जाना लोहे-लंगर से बनी … more →

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अपने ही लोग फूट डालने की नीति पर चल रहे हैं

दीपक भारतदीप wrote 2 years ago:                    अंग्रेज चले गये पर अपने संस्कार और संस्कृति यहीं छोड़ गये । उन्होने जिस तरह इस देश … more →

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अपनी सोच को बढाना है

दीपक भारतदीप wrote 2 years ago:                     जिनके दिमाग के हैं तंग घेरे और दिल हैं सोच के अँधेरे वही अपनी ख़ुशी और रोशनी के … more →

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चलना नाम है ज़िन्दगी का

दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: थका हुआ शरीर उदास मन सूनी आँखें और कांपती जुबान पूछते है पता वह सुख और ख़ुशी का ओढ़े हैं लिबास स्वार … more →

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सागर की लहरों जैसा है मन मेरा

दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: सागर की तरह मन है मेरा जब भी लहरों से खेलता है कुछ शेर ही जुबान से  कहला कर दम लेता है मैं भी उसे नह … more →

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पत्थर के शहर में

दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: जंगल के जंगल उजाड़ कर अब खुशबु के लिए आदमी प्लास्टिक के फूल सूंघता है पैट्रोल-डीजल और गैस से बिखेरता … more →

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अल्फाजों का समन्दर उफनता आने दो

दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: तुम रास्ते से हट जाओ अपने ज़ज्बातों को बहकर आने दो अल्फाजों का समंदर है अन्दर उसे उफनते आने दो कहने क … more →

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कोइ बताये सुख क्या होता है

दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: चारों और वृक्षों से घिरा खिर्की पर है सुन्दर कांच लगा चिकने पत्थर का फर्श रोशनी से चमकते हुए कमरे सभ … more →

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पहले अपने को ही पहचान ले मेरे मन

दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: किसके मन में क्या है कौन जानेगा अपने मन को ही भला कौन जानता है पल-पल हालात के साथ बदलता मन कौन लगाम … more →

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छोटी कविताएँ और हंसिकाएं और कुछ रुलाएं 1 comment

दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: आदमी और कुत्ते पर कविता सुनाकर वह लोगों को हंसाते हैं अपने नाम के आगे हंसी के बादशाह की पदवी लगाते ह … more →

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