दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: गुरु चेले जंगल से निकल कर शहर के मुख्य बाजार में आये, तो देखा सब जगह लोग मूर्तियों की तरह खडे थे. बा … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: उगते सूरज को करें सभी नमन डूबते से कभी नजर न मिलाएं कामयाबी के शिखर पर पहुँचा आदमी अपने चारों और … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: अपनी-अपनी सब कहैं सुने न कोई किसी की बात इससे तो अच्छा हैं हम मौन हो जाये अपने ही मन की सुने बात … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: बौद्धिक अँधेरे में ज्ञान के चिराग कुछ यूँ बेचे जा रहे हैं सदियों से अपनी जगह खडे बुत भी लोगों को चलत … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: जब पीते थे तो कोई बुलाता नहीं था मांगते थे तो कोई पिलाता नहीं था जब छोड़ दीं तो सब बुलाते हैं जैसे मय … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: क्रिकेट,फिल्म,राजनीति और और पत्रकारिता का क्षेत्र समाज में आकर्षण का केंद्र होते हैं । यही नहीं जिन … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: दोस्त हम ऐसा चाहें जो वक्त पर काम आये पर कितना सोचते हैं कि हम दोस्तो के काम आयें ऊपर से लेकर नीचे त … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: उनकी सोच है कि इधर लगाओ या उधर कहीं भी बस आग लगाओ किसी तरह अपनी रोटी पकाओ इन्सान को इन्सान से रगड़ क … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: मैं क्यों लिखता हूँ , मुझे नहीं मालुम ! अब सवाल भी अपने से है जवाब भी स्वयं ही दे … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: सीमेंट और कंक्रीट से बने बुतों को हसरत भरी निगाहों से देखे बिना अपनी राह चले जाना लोहे-लंगर से बनी र … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: अंग्रेज चले गये पर अपने संस्कार और संस्कृति यहीं छोड़ गये । उन्होने जिस तरह इस देश … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: जिनके दिमाग के हैं तंग घेरे और दिल हैं सोच के अँधेरे वही अपनी ख़ुशी और रोशनी के … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: थका हुआ शरीर उदास मन सूनी आँखें और कांपती जुबान पूछते है पता वह सुख और ख़ुशी का ओढ़े हैं लिबास स्वार … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: सागर की तरह मन है मेरा जब भी लहरों से खेलता है कुछ शेर ही जुबान से कहला कर दम लेता है मैं भी उसे नह … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: जंगल के जंगल उजाड़ कर अब खुशबु के लिए आदमी प्लास्टिक के फूल सूंघता है पैट्रोल-डीजल और गैस से बिखेरता … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: तुम रास्ते से हट जाओ अपने ज़ज्बातों को बहकर आने दो अल्फाजों का समंदर है अन्दर उसे उफनते आने दो कहने क … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: चारों और वृक्षों से घिरा खिर्की पर है सुन्दर कांच लगा चिकने पत्थर का फर्श रोशनी से चमकते हुए कमरे सभ … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: किसके मन में क्या है कौन जानेगा अपने मन को ही भला कौन जानता है पल-पल हालात के साथ बदलता मन कौन लगाम … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: आदमी और कुत्ते पर कविता सुनाकर वह लोगों को हंसाते हैं अपने नाम के आगे हंसी के बादशाह की पदवी लगाते ह … more →