वक़्त का पहना उतार आये कुछ लम्हे मरके गुज़ार आये ख़ाबों में सही अपना तो माना दिल को मेरे अपना तो जाना खट्टे-मीठे रिश्ते चख लिये हैं कुछ सच्चे पलकों पे रख लिये हैं ख़ाहिशों का बवण्डर है दिल दिल को उसके द… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविजय सारस्वत wrote 4 months ago: गिरती महंगाई दर में बेशकीमती हुई रोटी नई दिल्ली। सप्ताह दर सप्ताह कम हो रही मुद्रास्फीति के बावजूद आ … more →
विनय wrote 1 year ago: वक़्त का पहना उतार आये कुछ लम्हे मरके गुज़ार आये ख़ाबों में सही अपना तो माना दिल को मेरे अपना तो जाना … more →
विनय wrote 1 year ago: एक मैं ही था शहंशाह सारे जहाँ का जब तलक साया था सर पे हुमा का मेरी शिकस्त ही तक़दीर हुई मेरी जब जाना … more →
विनय wrote 1 year ago: वो तस्कीं न मेरे दर पे माथा टेके न ही रौज़न से झाँके सिर्फ़ - खा़बों को बे-रब्त किए घूमती है हर गली हर … more →