सहर-ब-सहर1 मैं ढूँढ़ता रहा शुआएँ2 कहाँ छिप गयीं नूर-सी रोशन निगाहें न कोई घर रहा मेरा न कोई ठिकाना मेरी मंज़िल तो बन गयीं अब ये राहें है जो दर्द सो अब तन्हाई से है मुझे असरकार हों, कुछ काम आयें दुआएँ3 … more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 3 months ago: सहर-ब-सहर1 मैं ढूँढ़ता रहा शुआएँ2 कहाँ छिप गयीं नूर-सी रोशन निगाहें न कोई घर रहा मेरा न कोई ठिकाना म … more →
sushilgirdher wrote 10 months ago: तेरी यादों को समेटकर रखें भी तो कहां दामन तो पहले ही शिकवों से भरा है। … more →
kmuskan wrote 1 year ago: तु कया लूटेगा उन लूटे हूओ को जो पहले ही वकत के हाथो लूटे है । तोड़ सकी जिस ना मुश्किलें हजार आज वो अप … more →
विनय wrote 1 year ago: कभी यूँ भी होता है ज़िन्दगी मिलती है खो जाती है यह शाम उसकी यादों में मुझको डुबो जाती है नहीं यह मुमक … more →