इस जानिब य उस जानिब कौन ‘नज़र’ है कौन ‘ग़ालिब’ एक बला है दर्दे-निहाँ कौन बुरा कौन भला साहिब यह मंडी भी ख़ूब है जिसमें दाम नहीं देता कोई वाजिब दिन को जी भर सो लिये हुए रात ख़ाबों… more →
तख़लीक़-ए-नज़ररविकुल wrote 5 months ago: ढूंढता हूँ खुशियाँ जमाने भर के लिये ! कुछ तो समाँ कर लूं अपने घर के लिये !! मुफ़लिसी से भी मै आराम पा … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: वफा अब मुफ्त में नहीं मिलती अगर दाम देने की ताकत हो पास तो बेचने वाले सौदागरो की भीड़ दिखती ओ बाजार … more →
विनय wrote 1 year ago: इस जानिब य उस जानिब कौन ‘नज़र’ है कौन ‘ग़ालिब’ एक बला है दर्दे-निहाँ कौन बुरा … more →