रोज़ सपनों में आता है इन रातों में जगाता है मैं क्यों न जानूँ उसको मैं न पहचानूँ उसको वह मुझसे अजनबी है लेकिन मेरा हमनशीं है मैं क्या नाम दूँ उसको यह दिल दिया जिसको उसके लिए दीवानी हूँ उस चाँद की चाँदन… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: रोज़ सपनों में आता है इन रातों में जगाता है मैं क्यों न जानूँ उसको मैं न पहचानूँ उसको वह मुझसे अजनबी … more →