याद आती हैं फिर वह तारीख़ें मेरा करना तुम्हारी तारीफ़ें लिखना पुराने ख़तों को दोबारा पूछना क्या नाम है तुम्हारा कुछ न मिले ऐसी शाम के तले इतना मान ले इतना जान ले वह साँसों का साँसों तक जाना क़रीब आकर फि… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: याद आती हैं फिर वह तारीख़ें मेरा करना तुम्हारी तारीफ़ें लिखना पुराने ख़तों को दोबारा पूछना क्या नाम ह … more →
विनय wrote 1 year ago: यह बीते हुए लम्हों का शोर है या तन्हाई के ग़म की ख़ामोशी दिल को कुछ शोर जान पड़ता है मगर वह कानों में … more →
विनय wrote 1 year ago: चाँद गवाह है मेरे प्यार का क्या यही ख़्याल है, मेरे यार का कुछ न ख़बर हुई उस पल की कुछ न पता चला उस … more →