एक पंखुड़ी का आलिंगन करती भारी भरकम काया लो चील ने फैला दिये अपने डैने मंडराया अंधियारे का साया निर्दयी सांपों की तरह घेरते तमाशबिनों का नाच रोती चिल्लाती लज्जा से दरिंदे पाते आंच खिलखिलाहट करती प्रेता… more →
हरिहर झाHarihar Jha हरिहर झा wrote 1 year ago: एक पंखुड़ी का आलिंगन करती भारी भरकम काया लो चील ने फैला दिये अपने डैने मंडराया अंधियारे का साया निर्द … more →