तन चंचला मन निर्मला व्यवहार कुशला भाषा कोमला सदैव समर्पिता | नदिया सा चलना सागर से मिलना खुद को भुलाकर भी अपना अस्तित्व सभलना रौशन अस्मिता | सृष्टि की जननी प्रेम रूप धारिणी शक्ति सहारिणी सबल कार्यकार… more →
mehekNidhi KM wrote 7 months ago: हर बार क्यों लक्षमण रेखा खिचाती है? हर बार क्यों अग्नि परीक्षा होती है? जब राम ही नही है आज यहाँ? फि … more →
rina56 wrote 7 months ago: सिप की तरह ढकी थी,अच्छी थी बाहर निकली तो बहुत झेलनी पड़ी देखा,मेरी ही साथिन मरी पड़ी थी … more →
दीपक भारतदीप wrote 9 months ago: नारी की आज़ादी विषय पर उन्होने महफ़िल सजाई दर्शक दीर्घा में पुरुषों के लिए भी कुर्सी सजाई पूछने पर ब … more →
pryas wrote 1 year ago: तुम नभ हो, मेघ हो, गर्जन हो, तुम धरती पर व्याप्त शक्ति, प्रजनन हो. तुम आग हो, शीतल हो, पानी हो, इस ज … more →
mehhekk wrote 1 year ago: तन चंचला मन निर्मला व्यवहार कुशला भाषा कोमला सदैव समर्पिता | नदिया सा चलना सागर से मिलना खुद को भुल … more →