वर दे, वीणावादिनि वर दे। प्रिय स्वतंत्र रव, अमृत मंत्र नव भारत में भर दे। काट अंध उर के बंधन स्तर बहा जननि ज्योतिर्मय निर्झर कलुष भेद तम हर प्रकाश भर जगमग जग कर दे। नव गति नव लय ताल छंद … more →
अभ्युदयGirijesh Rao wrote 2 months ago: प्रस्तुत कविता महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” की अति प्रसिद्ध रचना है. उऩ्हें अद्भुत … more →
Nishant wrote 3 months ago: कल आदरणीय ज्ञानदत्त जी ने और यूनुस भाई ने इवान तुर्गेनेव वाली कहानी के भारतीय सन्दर्भ के बारे में खू … more →
Satish Chandra satyarthi wrote 5 months ago: दिवसावसान का समय मेघमय आसमान से उतर रही है वह सांध्य सुंदरी परी-सी- धीरे धीरे धीरे। तिमिरांचल में चं … more →
kuldeepsingh wrote 1 year ago: वर दे, वीणावादिनि वर दे। प्रिय स्वतंत्र रव, अमृत मंत्र नव भारत में भर दे। काट अंध उर के बंधन स्तर … more →
संपादक- मिथिलेश वामनकर wrote 1 year ago: सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” रवि हुआ अस्त ज्योति के पत्र पर लिखा अमर रह गया राम-रावण क … more →