यह जिस्म नहीं है, काँच के टुकड़े हैं ज़मीने-वक़्त पर दूर तक बिखरे हैं इन्हें मत छूना हाथों में चुभ जायेंगे ये वो दिये हैं, लम्हों में बुझ जायेंगे… My hopes are broken My soul is bruised but you… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: यह जिस्म नहीं है, काँच के टुकड़े हैं ज़मीने-वक़्त पर दूर तक बिखरे हैं इन्हें मत छूना हाथों में चुभ जाय … more →
विनय wrote 1 year ago: दिल का जला होता तब रोशनी होती मैं तो जला हूँ चश्मे-अश्कबारी का… अब मेरी ख़ाक इक निहाँ दलदल है! … more →
विनय wrote 1 year ago: ज़हराब में बुझाते हैं तीर क्यूँ शिकार की अदा मैं भी जानता हूँ कितना मन मुकद्दर था उसका यह राज़े-निहाँ … more →