मेरे दिल की पगडंडियों से रोज़ाना कितने गुज़रते हैं कितने क़दमों के निशाँ बनते हैं कितने मिटते हैं… तू जिस दिन से गुज़री है किसी से कहते नहीं बनता हमारे सीने में इक ऐसी आँधी उबरी है सबसे यूँ ही मिल ल… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: मेरे दिल की पगडंडियों से रोज़ाना कितने गुज़रते हैं कितने क़दमों के निशाँ बनते हैं कितने मिटते हैं … more →