फूल पत्थर से उगेगा सोचता है आदमी, पर्वतों पिघलोगे इकदिन, सोचता है आदमी. चाँद पर तो घुमने हम कई बार आ चुके हैं, चाँद के आगे है क्या फिर, सोचता है आदमी. शम्मां के हिस्से में आए परवाने देखो कई हैं, परवान… more →
यह भी खूब रहीkmuskan wrote 1 year ago: कभी कभी ये सोचती हूँ कि क्या आंतकवादी इंसान नही होते अगर होते है तो क्यों उनकी आत्मा उन्हें धिक्कारत … more →
pryas wrote 1 year ago: फूल पत्थर से उगेगा सोचता है आदमी, पर्वतों पिघलोगे इकदिन, सोचता है आदमी. चाँद पर तो घुमने हम कई बार आ … more →
विनय wrote 1 year ago: मेरा माहताब जिसे देखा दिल हुआ बेताब मेरा मेरा मेरा मेरा माहताब जिसे देखा दिल हुआ बेताब जिसे देखा दिल … more →
विनय wrote 1 year ago: दिल के ख़ाब दिल में ही सुलगते हैं हक़ीक़त के निशाँ अभी दूर लगते हैं हल्की-हल्की आवाज़ें कानों में गुनगु … more →
विनय wrote 1 year ago: हम भी पागल थे ग़ैरों को अपना जानते थे रुसवा किये जायेंगे इस क़दर यह न जानते थे बेवफ़ा गर वह होता दर्द श … more →
विनय wrote 2 years ago: हम जितना करते हैं’ ग़लत करते हैं गर सही भी करते हैं तो ग़लत करते हैं तुमको बतायेगा कौन ख़ुदा भी … more →
विनय wrote 2 years ago: लहर इक ‘विनय’ टकराया जो पत्थर से टूट गया जब भी निकला आगे उसके हाथों से एक हाथ छूट गया जब भी बैठता है … more →
विनय wrote 2 years ago: यह कौन-सा मुक़ाम है? जहाँ आकर सब चेहरे एक-से हो जाते हैं दिल रेत बनकर सीने में गहरा और गहरा धँसने लगत … more →