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Blogs about: पर्यावरण

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हम गुड़ क्यों नही खाते ?3 comments

Krishna Kumar Mishra wrote 2 weeks ago: सरकार की अर्थनीति, व्यापारनीति, और राजनीति इन तीनों चीज़ों से मैं कोई राफ़्ता नही रखता और न ही मुझे … more →

Tags: History & Environment, गन्ना, गुड़, चीनी, मिठास, मिल, शकर, समुदाय, सरकार

एक भी आदमी मरने नहीं दिया जायेगा । (व्यंग्य/कार्टून)4 comments

K M Mishra wrote 4 months ago: देश के 141 जिले सूखे की चपेट में हैं । लोगों को आवश्यक सामानों की मूल्य वृद्धि के लिये तैयार रहना चा … more →

Tags: भूख, सूखे, hindi, hasya, vyangya, हिन्दी हास्य व्यंग्, राजनैतिक विसंगतियों, भ्रष्टाचार, Cartoon

बरसात के साथ धार्मिक चालाकी-हिंदी व्यंग्य (hindi vyangya)

दीपक भारतदीप wrote 5 months ago: अध्यात्म नितांत एक निजी विषय है पर जब उसकी चौराहे पर चर्चा होने लगे तो समझ लो कि कहीं न कहीं उसकी आड़ … more →

Tags: अनुभूति, अभिव्यक्ति, कला, मस्तराम, व्यंग्य, हास्य व्यंग्य, हिन्दी, हिन्दी पत्रिका, Blogging

उत्तर भारत में सूखे की आशंका (व्यंग्य, कार्टून)1 comment

K M Mishra wrote 5 months ago: =>सखी, इस भीषण गर्मी में चार कोस दूर तालाब से मटकी में पानी भर कर लाते-लाते मेरे पैरों में छाले प … more →

Tags: hasya -vyangya, हिन्दी हास्य व्यंग्, आर्थिक, राष्ट्रीय, बाजार, मीडिया, Humor, Cartoon, मौसम

थार की बूढी नानी 2 comments

prithvi wrote 6 months ago: बूढ़ी नानी की कहानी थार की बालुई रेत में गुलाबी या चटक लाल रंग का एक छोटा सा जीव मानसून की पहली बारि … more →

Tags: गांव- गुवाड़, थार, लाल गाय, बूढी नानी, रेगिस्‍तान

तन-मन धन से करें जो सेवा6 comments

प्रेमलता पांडे wrote 8 months ago:                 धरती से है दिन और रात, फिर कैसी यह बात? झेंप मिटाने की साजिश , या बाज़ार की है ख़ारिश? … more →

Tags: भावांजलि, धरती-दिवस

प्राण-आधार2 comments

प्रेमलता पांडे wrote 9 months ago: नीर की बूंद, तारे शुष्क टेंटुआ, प्राण-आधार। जल ही जीवन है बार-बार कहने पर भी हम नहीं सुधरते। तुर्रा … more →

Tags: फोटोशॉप और मैं, नीर की बूंद

बहुत कुछ लुटा के होश में आए तो सही!3 comments

प्रेमलता पांडे wrote 9 months ago: आजकल जब भी बाज़ार जाते हैं और कुछ ऐसा सामान खरीदते हैं जैसे- सब्जी, फल या अन्य वह सब चीज़ें जो छोटी थै … more →

Tags: चित्राकंन, लेख/आलेख, थैले/झोला

आपकी मर्ज़ी?1 comment

प्रेमलता पांडे wrote 9 months ago: विकल्प हमें ही चुनना है। प्रकृति तो सदा ही सामंजस्य और समन्वय बैठाती रही है, पर हम अपनी घटिया हरकतों … more →

Tags: विरासत, फोटोशॉप और मैं, मर्ज़ी, नुकसान, कुल्हाड़ी, पालन-पोषण

दारू सुलभ, आलू सस्ती । खींचो पापड़ संग विस्की । (हास्य/व्यंग्य: होली)

K M Mishra wrote 10 months ago:   -बुरा न मानो होली है, हिक्क !                                   पड़ोसी के आंगन में खड़ा दशहरी खड़े-खड़ … more →

Tags: hasya -vyangya, हिन्दी हास्य व्यंग्, सामाजिक, राजनैतिक विसंगतियों, भ्रष्टाचार, कुरीतियों, राष्ट्रीय, बाजार, मीडिया

मेरी गली के जानवर

K M Mishra wrote 10 months ago: सवेरे के साढे छ: बज रहे हैं और मैं मुँह में टूथब्रश घुमाता लॉन में खड़ा हॅंू । सड़क पर बुङ्ढेजन, जनी अ … more →

Tags: hasya -vyangya, हिन्दी हास्य व्यंग्, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक विसंगतियों, भ्रष्टाचार, बुराइयों, कुरीतियों, राष्ट्रीय

चिड़चिड़ी

Harihar Jha हरिहर झा wrote 10 months ago: केवल उंगलियां देख कर घबराती ग्वालिन देख रही अपनी ’मौसी’ का चेहरा - आग-बबूला पहाड़ से लुढ़कते पत्त्थर स … more →

Tags: अतुकांत, हिन्द-युग्म, प्रकृति, मौसी, विकास, व्यंग्य

हिन्दी, हिन्दू और हिंदुत्व:नए सन्दर्भों में चर्चा (१)

दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: हिन्दी,हिन्दू और हिंदुत्व शब्दों में जो आकर्षण है उसका कारण कोई उनकी कानों को सुनाई देने वाली ध्वनि … more →

Tags: हिन्दी, समाज, dharm, धर्म, hindi, प्रचार, hindu, ज्ञान, अध्यात्म

कौन कब्ज़ा कर ले!2 comments

प्रेमलता पांडे wrote 1 year ago: घर से दो दिन के लिए ही क्यों न जाओ डर ही रहता है कब कौन कब्ज़ा करले! समय ही ऐसा है। सब को अपनी-अपनी प … more →

Tags: लेख/आलेख, कबूतर

गौरैया को कैसे बचायें?2 comments

उन्मुक्त wrote 1 year ago: हैमलेट (Hamlet) में, विलियम शेक्सपीयर (William Shakespeare) ने लिखा, ‘Not a whit, we defy augu … more →

Tags: हिन्दी, Environmentalism

विकास यानि वाहनों की चौडाई बढना सड़क की कम होना 1 comment

दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: बहुत समय से देश के विकास होने के प्रचार का मैं टीवी चैनलों और अख़बारों में सुनता आ रहा हूँ. तमाम तरह … more →

Tags: Blogroll, Hindi hasya, hindi journlism, hindi web, hindi epatrika, web duniya, web dunia, hindi nai duinia, hindi megzine

पहले आतंकवाद आया कि पर्यावरण प्रदूषण 2 comments

दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: पहले इस नई दुनिया में पर्यावरण प्रदूषण फैलना शुरू हुआ या आतंकवाद? यह प्रश्न ऐसा ही है कि पहले मुर्गी … more →

Tags: sampadkeeya, Global Dashboard, inglish, अभिव्यक्ति, संपादकीय, bharat, चिन्तन, साहित्य, Education

सिगरेट का धुआं छोड़ते हुए 1 comment

दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: मुख से सिगरेट का धुँआ चहुँ और फैलाते हुए करते हैं शहर में फैले पर्यावरण प्रदूषण की शिकायत शराब के कई … more →

Tags: Blogroll, Hindi Poem, Hindi hasya, hindi kavita, Hindi friends, hindi web, hindi epatrika, web dunia, hindi megzine

जब फूलों को देखने के लिए पैसे देने होंगे

दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: अगर एक अखबार की खबर पर यकीन करें तो आगे चलकर प्रकृति को निहारने के लिए भी पैसे देने पड़ेंगे. इस मामले … more →

Tags: Blogroll, writing, Dashboard, aastha, संपादकीय, व्यंग्य चिंतन, अभिव्यक्ति, बिंब-प्रतिबिंब, हास्य व्यंग्य


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